लक्ष्य!..एक यात्रा!
बचपन से जूनूनी था मैं,कक्षा ८ वीं तक कोई लक्ष्य क्या होता है इससे अनजान था, मेरा ज्यादातर समय क्रिकेट खेलने और गाँव के बच्चों के साथ शरारतें करने में ही बीतता था,परिवार में पढ़ाई के प्रति विशेष दृष्टिकोण थे सबके, इसलिए थोड़ा बहुत पढ़ भी लिया करते थे। फिर ९ वीं में दो महान गुरुजन मिले उनके मार्गदर्शन से मेरा जूनून अध्ययन की तरफ एकाग्रचित्त हुआ। और फिर शानदार परिणाम भी प्राप्त हुए। मुझे याद है जब भी मैं अपनी दादी के लिये कुछ अच्छा करता तो दादी आशीर्वाद देती "जज कलक्टर बन जा! बाबू" फिर पिता जी ने बातों बातों में मुझे समझाया कि विज्ञान वर्ग के विद्यार्थियों के लिये १२ वी के बाद आई आई टी की परीक्षा उत्तीर्ण करना सबसे सम्मान जनक होता है। उसके बाद मैं दादी से अर्थात माई से कहता कि अब मुझे इंजीनियर बनने का आशीर्वाद दो! फ़िर दादी मुझे " बड़का इंजीनियर बन जा बाबू" हमेशा यही आशीर्वाद देती! फिर दादी का निधन हो गया। और मैं गोरखपुर शहर में आ गया गाँव से। अब मैं इंजीनियरिंग की पढाई के पीछे पड़ा रहता था। मेरे श्रेष्ठ मार्गदर्शक गण भी अंदर ही अंदर महसूस करते मैं बड़ा इंजीनियर बनूँगा! १२ व...