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अदिती

बुदबुदाहट हो रही है आहिस्ता आहिस्ता बर्फ पानी हो चुका है भाप भी हो जाएगा! ताप की दुनिया, निरन्तर हो चली वर्तुल भयंकर तुम क्या समझोगे बगावत प्यार में होता है क्या! जिंदगी है नित-निरन्तर अनवरत आवेग में... कही है फ़ैलाव-सी ये कही एक सिकुड़ाव है.. या कही  है एक दलदल मच रही है रोज हलचल मैं हुआ अब मौन तुमसे कुछ नही कहना हमे जो भी कहना था हमे हम कह चुके तुमसे...हे प्रियतम! भाग्य को है अब नमन हाँ भाग्य को है अब नमन! अब न कोई काश है अब न कोई आश है दुख की या संघर्षों की रजनी से देखो पार हुआ पतवार मिला,पतवार मिला आया प्रभात आया प्रभात सन्ध्या का मुझको ज्ञान हुआ ये प्रखर रश्मि कुछ पल की है रजनी अखण्ड अनवरत रही अस्तित्व इसी से है सबका फिर क्यों प्रभा से दूर रही?.......... सत्य है प्रिय इस निरन्तर धार की अद्विती हो तुम! किन्तु दुनिया की रीति रही है कुछ ऐसी जो प्रत्यक्ष नही होने देती! तुम ही समझो श्रेय है ये जगत ये समझे न समझे पत्र की भी पात्रता मैं खो चुका हे! मेरे प्रियवर! जब द्वय ही नही रहा है शेष! संसार का मैं अभिषेश! कैसे कविता सम्पूर्ण करूँ मैं छं...

अब बस!

काश कि कोई "काश"होता! दरम्यान हमारे तुम्हारे! किन्तु अब आस भी नही तो "काश!" कैसे होगा! हा अनन्त हो तुम अब मुझमे साथ नही है बस ये जानो! सत्य ये भी है कि मेरी पात्रता भी नही है साथ की! और अब......बिखरा हुआ-सा मैं न जाने कितने चेहरे गुजरे हैं मुझसे होकर! न जाने कौन-से रास्ते होंगे न जाने कौन सी मंज़िल होगी! तुम हो! तुम रहोगी मुझमे! एक द्वीप जैसे रहता है सागर में ही किन्तु जुदा-जुदा! न जाने तुम कौन थी न जाने राह कौन थी! मै तो गया ! मय में हु मैं भय नही है कोई लय में हूँ मै न राधा न रुक्मिणी कोई नही मिली मैं तो मीरा के संग हो चला! नही मैं कृष्ण न ही मैं राम! अदना-सा आदम! जाओ तुम दूर इस सागर से द्वीप काश की कोई अगस्त होता जो द्वीप को मुकम्मल कर देता!

माँ

कोई नही आएगा तुम्हारे पास,कोई भी नही, ये हो सकता है कि तुम्हे लगे कि एक भीड़ गुजर रही है तुम्हारे इर्दगिर्द.... उन्हें अपना मत समझना,अपना समझने की भूल मत करना!ये आवागमन जारी रहेगा आत्मतत्व से सभी एक ही पेड़ के पत्ते हैं! वो पत्ते जो कभी मिलते नही एक दूसरे से उनका काम है बहना! हवाओं के साथ ,उनका काम है झूमना फिज़ाओं के साथ! तुम भी झूमो तुम भी चूमो माँ है सृष्टि ! माँ है शक्ति माँ ही सारा जीवन है! रक्त कणों में बहता समय है! और समय ही आत्मा है!

नीर

समय? ये भी कोई चीज है एक मुसाफिर जा रहा है... और कहीं पे आ रहा है बीच मे है कुछ नही बस संगी-साथी मरहमी हैं किन्तु है ठहरा नही कुछ चल रही है ये फिजा... क्यों है? किसको है पता.. कुछ लिखावट ऐसी है जो बाद में समझूंगा मैं मैं नही समझा रहा पदचिह्न छोड़े जा रहा।। राह में है कुछ मुसाफिर ऐसे भी मुझको मिले.. वो मिले या न मिले ये और बात है...पर मैं? मिले और गले मिले जा रहा आनन्द मिलन के गीत गाते जा रहा।। सदियों से कइयो ने लिखी है अधूरी दास्तां... मैं भी कोशिश में हूँ कि... इक पूरी तो कर जाऊं यहाँ... ज़िद ये पूरी हो गयी. नज़रे मिली जिस दिन मिरी.. तुमको हो या हो न ये एहसास मुझको हो गया रास्ते का एक मुसाफिर रास्ते में खो गया.... तुमको पीया है मेरी नज़रो ने इतना हे प्रिये हर तरफ श्रृंगार का मंजर मुझे दिखने लगा खो दिया हूँ इश्क़ में सारी जमा पूंजी यहाँ पा लिया नयनों में तेरे पल में ही सारा जहाँ... माना मैंने धीर की,तुझमे कमी कोई नही मैंने भी तो धीर का निर्माण है छोड़ा नही प्रिय-मिलन में कोई भी हो पथ मुझे मंज़ूर है तुमपे कोई आंच आये ऐसा हो सकता नही रिश्ता ये जन्मो...

ऐ-ज़िन्दगी!

ज़िन्दगी अप्रतिम है.. बीत जाती है, समझ नही आती कहीं दूर-दूर तक यातनाओं और पीड़ा का सफर कहीं बर्फ के तीखे एहसास-सी समझ आती है... समझ, ज़िन्दगी और उलझन ये तीनों घनिष्ठ मित्र हैं.... जैसे-जैसे समझ बढ़ी ज़िन्दगी घनीभूत हुई और फिर उलझनों का अपार संसार विस्तृत होता है... सत्य सदियों से वैरागी रहा है झूठ सदियों से भोग के जकड़न में रहता है किन्तु दुर्भाग्य ये है कि झूठ ने सत्य को कैद कर दिया है... सत्य को प्रताड़ित किया है... झूठ के पास वस्त्र होते हैं... सत्य निर्वस्त्र होता है.... इसलिये जब भी सत्य झूठ के मोहल्ले से होकर गुजरा...झूठ ने उसे असामाजिक घोषित करके उसके पांवों में बेड़ियाँ डलवाया मारा-पीटा सूली पर चढ़ाया.. अधिकतम ज़िंदगियाँ मुझे सरकारी कार्यालयों की धूल से चिपटी-लिपटी ज़िल्द-सी ही दिखती हैं... ज़िन्दगी तू सचमुच एक रहस्य है रहस्यों का रहस्य हैं! और ऐ-ज़िन्दगी तूने सत्य को इतना अकेला क्यों कर दिया!

काला जादूगर

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वो शायद प्रेम से तबतक न परिचित रही हो मैंने ही उसे प्रेम करना सिखाया.. प्रेम की एक-एक सूक्ष्म सत्ता से उसका परिचय कराया। हम दोनों में कौन ज्यादा समझदार है ये बात अभीतक अज्ञात है हम दोनों ने साथ-साथ शादी के हसीन ख्वाब देखे एक वादियों भरी बस्ती में घर बसाने के ख्वाब देखे.... ऐसे ही वक़्त गुजरता जा रहा था हम इश्क़ का रसपान कर रहे थे पूरी दुनिया को भुलाकर... इसी प्रवाह में एक दिन हमदोनों से सफर में एक भूत मिला बहुत बुरे हालात लग रहे थे उसके,किन्तु था वो बहुत शक्तिशाली....... वो एक काला जादूगर था और बहुत निर्दयी भी था उसके साथ के प्रारंभ से ही हमारा प्रेम घृणा का रूप लेता गया और एक दिन हमे बिछड़ना पड़ा हम अब एक दूसरे की शक्ल तक नही देखते बात-चित तो दूर की बात है... हा हमारी तन्हाई में वो भूत हमारे साथ रहता है.. वो भूत है समाज!

रिश्तों की समझ!

सचमुच हर रिश्ते की एक उम्र होती है... वैसे ये भ्रम रहता है रिश्तों को अबाध और अनन्त होने का किन्तु......ये मात्र भ्रम है... जब दो मिलते हैं तब रिश्ते बनते है एक  नाम मिल जाता है प्रत्येक रिश्ते को..... फिर इसे सच्चे और झूठे के तराजू पर तौला जाता है.... परन्तु सच्चे रिश्ते तो आसमान में बनते हैं और आसमानी रिश्ते हमे आमतौर पर नही दिखते हैं। इसका मूल वजह जानना चाहता हूं कि क्यों? अन्तस् से आवाज आती है.....'समझ' और पुनः मैं एक निष्कर्ष पर आता हूँ  आदमी कम समझदार..... और वैज्ञानिक उन्नति मुझे दो थप्पड़ मार के सुला देती है।

भय!

बहक जाते है अक्सर लोग जब वो किसी से अत्यधिक स्नेह करते है स्नेह आत्मा को जगाने का काम करता है लेकिन समाज सदियों से स्नेह के विपरीत रहता है और इस तरह से समाज स्नेह को,विशुद्ध स्नेह को कुचल देता है, बड़ी बेरहमी से कुचल देता है। स्नेह बिल्कुल सरल होता है,स्नेह एक सहज भाव है जो स्वस्थ्य चित्त में उपजता है.....बिल्कुल सौम्य है स्नेह का रूप। आज के दौर में स्नेह दिखता ही नही और यदि दिखता है तो बहुत कम है इसकी मात्रा। लोग यन्त्र हो गए हैं यंत्रवत व्यवहार करते चले जा रहे हैं। ये यंत्रवत्ता त्यागे बगैर कैसे हो प्रेम से परिचय। मुझे बहुत कम लोग मिलते है जो प्रसन्न हो सबके सब शिकायतों से भरे हैं,मैं भी भर गया हूँ शिकायतों से इन लोगों से मिलकर। मैं कभी-कभी रुकता हूँ किसी भीड़ से भरी सड़क के किनारे, खड़ा हो जाता हूँ और गौर से देखता हूँ लोगों को,लोग मुझे नदी के बहाव में बहते दिखते हैं तड़पते दिखते हैं..... सब एक आपाधापी में लगे हैं भयंकर आपाधापी। मेरे मन मे ख्याल आता है कि किसी को रोकू सहज होकर उसके हृदय की हाल सुनु,अपनी कहूँ मैं कह-सुन भी पाता हूँ ये सब जो गरीब होते हैं,अमीरों क...

भँवर!

दर्द लिख दूं मैं एहसास लिख दूं मैं मगर कैसे लिखू वो ख़्वाब जो टूटा हुआ-सा है... कहा था कि नही कुछ होगा मुझे तेरे जाने के बाद बहुत कुछ टूट कर देखो यहाँ, बिखरा हुआ-सा है... ये कैसे चल रही सांसे ये कैसे बह रही आहें तुम ही तुम हो यहाँ देखो तरसती जा रही आँखे... ये शब्द भी अवसाद हैं जीवन-डगर की प्यास है कि तुम नही मिली मुझे गिला नही कोई मुझे... मगर कोई है मुझमे जो मेरे बाद भी रोता है मैं लाख सुलाता हुँ वो हरगिज नही सोता है.... कभी-कभी जी मे आता है वीरान जंगल सा जलता जाता है मेरे अंदर एक दावानल ये कब बुझेगा..... सांस और तुम हमेशा साथ आती हो, दिखाई दो या न दो हमेशा पास रहती हो... कि मैं बावरा हुआ-सा भागता जा रहा हूँ मगर तुम और तुम्हारी यादे मुझे भागने नही देती.... ये आंखे अब कभी यूँ ही मैं मूँद नही पाता इन काँपते हाथों से ज्यादा लिख नही पाता.... ये ज़िन्दगी मेरी अब दोस्त बस मेरी नही रही तुम्हारे बाद इसमें अब हज़ारों लोग बसते हैं.... और मैं अपाहिज होकर देखता ही रहता हूँ बस देखता-देखता-देखता सा गुजर जाऊँगा मैं इस भँवर से।।

प्यार की गृहस्थी!

प्यार गृहस्थ का घर होता है वो बड़े संघर्ष के बाद निर्मित होता है प्यार के निर्माण में प्रेमी सब कुछ दांव लगाता है। ये सब कुछ आसान नही होता प्रेमी की पहचान मिट जाती है जमाने की गालियों से मुकाबला करता है वो बड़ी श्रद्धा से विश्वास से युक्त प्रेमी स्वयं में परमात्मा को अधिस्थित करता है.. स्वाभाविक प्रक्रिया है प्रेम बाकी सब,प्रेम के अतिरिक्त जैसे घृणा, द्वेष डाह इत्यादि विशिष्ट है क्योंकि इसे मनुष्यों ने बनाया है! इन्ही की विशिष्टता के कारण दुनिया जटिल है अत्यधिक जटिल..... इस प्यार की गृहस्थी का सबसे बड़ा सत्रु है अविश्वास,शंका एवं सन्देह!

मैं ही मुझसे...यूँही!

रहना है तुमको इसी जगत में रहना है यूँही रोकर-हंसकर तुम हो अनूठे विरले हो... पीड़ित हो रोगों से तुम... अपनों से और परायों से। किन्तु तुम्हे ये याद रहे... जो पीड़ित है वो तुम नही हो वो मन है और मन का मनुष्य है! और तुम मनुष्यता से भी परे एक अनन्त चैतन्य हो... अतः पीड़ित न रहो, जो भी पीड़ा है ये पुष्प बनेंगे और ये पुष्प भी मात्र दो दिन बाद झड़ जाएंगे.... और झड़ने के बाद फिर पीड़क और पीड़ित की ये सृंखला पुनः प्रारम्भ हो जाएगी.... इसलिये अनुग्रह का भाव मत त्यागना चाहे कोई भी विपदा हो आपदा हो अपने रोम-रोम को अनुग्रह से भर देना बल्कि उनको ज्यादा जो तुम्हारे पीड़क हैं इसलिए कि वो तुम्हे तुम्हारी चेतना से मिलाते हैं! जब तुम यूँही जीवन प्रवाह में बहोगे निर्विकल्प,निर्विवाद एवं अनासक्त! ये जीवन-चक्रण की सृंखला टूट जाएगी और तुम अंतरिक्ष मे समाहित हो जाओगे! इसलिए तुम मेरी ये समस्त बाते याद रखना! तुम्हारा! सार्थक साथी! जो तुम्हारे साथ अनवरत काल से है!

आँसू

आँसू! जब समस्त व्यथा का निचोड़ आंसुओं से अभिव्यक्त हो जाये! कर्म-कल्मष सारे पाप धुल जाएं वो पल सुखमय हो जाये आँसू नयनों में आएं! अट्टहास से ज्यादा मुझको आँसू ही भाते हैं.... तुम करते हो मन को भाररहित पीड़ा बह जाती तुम संग! तुम अद्भुत सखा हमारे हो हे आँसू आते रहना मन को सहलाते रहना!

दिवानगी!

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प्रेम ही मेरा धर्म प्रेम ही मेरी जाति है प्रेम में मैं हमेशा अधिस्थित रहा, बचपन से माँ का प्रेम नही छूटा। माँ मेरे अंतरतम में जीवित है... जीवित रहेगी मेरी आखिरी सांस तक। माँ प्रकृति होती है पुत्र पुरूष होता है माँ से छूटना दुरूह है या ये कहिये बेहयाई! स्मृति भी प्रकृति का अंग है और हे प्रिय! तुम्हारी स्मृतियां जाती ही नही। तुम भी माँ हो और मैं तुम्हारा दुलारा पुत्र मैं अपने व्यवहार में अतिरेक कर सकता हूँ! तुम्हे रिझाने के लिये!कि तुम मेरे पास रहो माँ की तरह! पिता भी माँ में समाहित हैं,पिता जैसी जिम्मेदार बनके मुझे परिवार की "अनुभूति" कराओ! मेरे अंतस में अपार पीड़ा है अपनी एक झप्पी लगाकर मेरे प्राण को मुक्त कर दो! क्योंकि मुझे नही रहना अब इस धरा पर मैं बस तुम्हारे स्नेह के इंतज़ार में रुका हूँ सांसो को बेबस होकर देख रहा हूँ स्वांसों से सटी आत्मा की तृष्णा हो तुम और जो मुक्त कर दे प्राण को वो "निर्वाण" भी हो तुम! तुम्हारे पाँव आएँगे मेरे पास मेरी कोई दहलीज़ नही! तुम्हारी इच्छा बस तुम्हे मेरे तक मेरे प्राण तक, पहुंचा देगी! इंतजार में ही ...

आपकी एक मुस्कान!

बातो-बातो के दौरान मुझे एक दिव्यानुभूति हुई सामने आपके बैठा हुआ मैं और आपकी एक सहज मुस्कान! योगेश्वर श्री कृष्ण द्वारा दिया गया एक अतिश्रेष्ठ उपहार.... आपकी वो सहज मुस्कान। तपस्या का फल मिलता है मैंने तपश्चर्या में तमाम उम्र गुजारी उसका प्रतिफल आपकी अद्भुत सौम्य मुस्कान! वो मुस्कान मेरे ज़हन में ज़िंदा रहेगी, फलेगी फूलेगी मेरे मरने के बाद भी मेरे प्राणों की अनुभूति संग अखण्ड रहेगी। आपका आश्चर्य भरा प्रश्न आपका दरवाजे पर ख़ड़े-खड़े मुझको अंदर ले जाकर बिठाना.... इतनी गहन अनुभूति कि मुझे अब कोई ख्वाहिश नही रही अब आप अंतर्निहित हैं मुझमे... बस अपनी मुस्कान को गले लगाकर कठिन-से कठिन लक्ष्यों में लगे रहिये क्यूंकि मुझे देखना है वो दिन जब आप अपने जीवन के समस्त लक्ष्यों को बहादुरी से प्राप्त करे! और अपनी जीवन यात्रा की सार्थकता को हासिल करें! आपका अहिंष्य!

अकेलापन एक घाव!

जब मैं अकेला होता हूँ, जब कोई नही होता है मेरे एहसास में.... एक समुंदर में उतरता हूँ मैं जिसका पानी खारा नहीं मीठा होता है...... ये मीठा जल मेरे समस्त कड़वे तमस को समाहित कर ले जाता है स्वयं में.... और उस वक़्त मुझे सबको त्याग कर.. अकेले और अकेले बस अकेले चलने का जी होता है! सारे रिश्ते मुझे स्वांग लगते है उस वक़्त...जितना करीब रिश्ता उतने ही जटिल घाव.... ये घाव ऐसे हैं जो मरहम से नही वक़्त के साथ ठीक होते हैं... घाव का डर नही मुझे घावों से भरा इतिहास है मेरा और घावों से भरा भविष्य भी होगा... अकेलापन भी एक घाव ही है एक विशिष्ट घाव... काश! ज़िन्दगी भी माँ की तरह होती सन्तोषी माँ की तरह...जिसने आजतक मुझसे कोई शिकायत नही की! किन्तु ये असम्भव है ज़िन्दगी माँ नही अपितु पिता की फटकार है फ़टकार... ज़िन्दगी का भी कोई चरित्र नही ज़िन्दगी चरित्रहीन है....एक तवायफ़ है... जो बदलती रहती है बहती रहती है कभी इस ओर कभी उस ओर... ज़िन्दगी को फ़र्क़ नही पड़ता अकेलेपन से दर्द से,उलाहनों से! ज़िन्दगी तो बस पीसती रहती है नए-नए रंग से नए-नए ढंग से... इस पीसती-पिसाती हुई ज़िन्दग...

कब्ज़!

क्या ये जो मैं लिखता हूँ ये यूँही है? या इसका कोई उद्देश्य है!ये प्रश्न मुझे परेशान करते हैं कभी कभी!तब मैं आसान-सा जवाब दे देता हूँ इन प्रश्नों को ज़िन्दगी का हवाला देते हुए। ज़िन्दगी भी तो हम बेवजह ही जीते हैं,है कोई जानता कि जिंदगी का एक-एक पल जो व्यतीत हो रहा है इसका उद्देश्य है या उद्देष्यविहीन है। फिर मैं जवाब भी यथेष्ट देता हूँ इन प्रश्नों का;कि मैं उल्टी करता हूँ अपने विचारों का जिससे मुझे कब्ज़ न हो! क्योंकि कब्ज़ मेरे मुल्क में ८०% लोगों को है। मैं अपनी कब्ज को ठीक कर लेता हूँ लोगों की फ़िक्र करने वाला मैं होता ही कौन हूँ! मुझे तो मेरे मैं को भी विसर्जित करना है और कर रहा हूँ नारायण के संरक्षण में। एक बात जो ध्रुव-सत्य है कि व्यक्ति का मित्र भी एवं शत्रु भी वो स्वयं ही होता है।चुनाव निर्धारित करता है आगामी जीवन। हम सुधरंगे नही किन्तु अभिलाषा है सम्पूर्ण जगत सुधार ले।         बात जब देश की आती है तो मुझे तंत्र और तंत्र-संचालन देख कर घृणा होती है। चार वर्ग राष्ट्र में अगर ढंग से कार्य करे तो लगभग ९०%  समस्या वैसे ही सुधर जाएगी पुलिस, एडवोकेट, शिक्ष...

उत्सुकता!

जीवन एक प्रवाह हुआ है यही सत्य है बाकी मिथ्या! स्वप्न ही यथार्थ हुआ है... तुम हो भी या हो तुम मिथ्या! तुमसे कब मैं मिल पाऊंगा मन मे मची है एक खलबली! क्यों आखिर ये है बेचैनी क्यों आखिर हर घुट स्वांस की नाम तुम्हारा लिये हुए है! क्या "रहस्य" है जीवन का तुमसे है सम्बन्ध मेरा क्या? आती-जाती स्वांसों से बस.. अब यही प्रश्न है शेष रहा...। तुम प्रतिपल हो, तुम जीवन हो तुम्ही प्रेयसी तुम दिव्यानी! मेरा, तुमसे जीवन विलग नही है तुम ही हो बस तुम ही तुम हो... मैं हूँ कहाँ?यही उत्सुकता बस मन मे है! मैंने जीना छोड़ दिया है डर के नही, मिल के तुमसे तुम जीवन-सरिता में प्रिय पतवार हो-रखवार हो।। वक़्त मिले गर तुमको प्रिय, एक बार बस मिलने आ जाना... क्या-क्या सोचा-जिया तुमने, एक बार आकर बता जाना! मेरे जाने के पहले तुम... बस यही "रहस्य" सुलझा जाना।। रोएं-रोएं की अनुभूति को मुझको तुम समझा जाना!

प्रेम एक महादान!

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प्रेम प्रस्फुटित होता है हजारों विपदाओं को सहर्ष स्वीकारने के बाद। प्रेम प्रस्फुटित होता है जब पाने की कोई अभिलाषा शेष न हो।मसलन त्याग और प्रेम एक दूसरे के पर्याय हैं या दोनों एक दूसरे के पूरक हैं।यूँ तो प्रेम ढाई अक्षर का शब्द हैं मात्र किन्तु वृहद पैमाने पर इसकी धारिता असीम होती है।प्रेम परमात्मा को प्राप्त करने हेतु एक सोपान है और आवश्यक सोपान है;बिना प्रेम के परमात्मा की कल्पना भी नही की जा सकती।     ये आवश्यक नही है कि प्रेम प्रेयसी से या प्रेमी से ही हो बल्कि प्रेम तो एक अवस्था है हमारी चेतना का,जब हम प्रेम में होते है तो लुटाते हैं, जो कुछ भी हो हमारे पास और जब हम बुद्धियुक्त होते है तो पाने के फिराक में रहते हैं।    इसलिए प्रेम एक महादान है जो हम किसी को देते हैं और एक बात प्रेम की गणित बिल्कुल उल्टी है जो बाटने से बढ़ती है..     हमें सिखाना होगा प्रेम अपनी पीढ़ी को,आगन्तुक पीढ़ी को क्योंकि प्रेम ही वो विकल्प है जिससे संघर्ष विसर्जित होता है। दुनिया के समस्त संघर्षों के अस्तित्व के मूल में प्रेम का अभाव है।दुनिया के समस्त संघर्ष मात्र वर्चस्व के ...

आँखे!

नयन आपके थे, अनवरत साधिका के.. नयन मेरे भी थे... हमेशा से झुके-झुके! प्यास थी मुझमे जन्म-जन्मों की आपमे स्थिरता है युगों-युगों से देखने के बाद आपको पहली मर्तबा.. नयन हैं पुंसवित करते नित-नित कुछ... समय के साथ-साथ प्रिय झुकी नजरों का आदी 'मैं' विसर्जन में लगाया खुद को वासना के निर्मूलन में.... हुए परिवर्तन नित-नूतन रही नही कोई "आकांक्षा" अब किन्तु-किन्तु-किन्तु..... अब मैं आपके साथ हूँ अनन्त काल तक अखण्ड... बस तबसे, जबसे नयन मेरे मिले नयन से किसके? आपके नयन से! दो नयन मिले बस की मेरी सांसारिक मृत्यु हो गयीं... अब मेरी आत्मा आपकी आत्मा में स्थापित है..... प्रभाकर अब निशा की अखंडता में अहर्निश निद्रा में सो रहा है.... निर्द्वन्द्व, निर्विकार, निर्विकल्प!

खत..९

दिन भर चलता रहता हूँ एक क्षण नही रुकता हूँ ना काहू से दोस्ती! ना काहू से बैर.... क्यों क्योंकि मैंने अनुभूत किया है आपको रोम-रोम से आत्मा तक! आपको पाने की अभिलाषा भी नही न ही खोने का डर... आपकी छवि,मुस्कान,माधुर्य ये औषधि हैं मेरे लिये आपकी एक तसवीर भी नही मेरे पास किन्तु आप सजीव विचरण करती हैं..मुझमे.. क्या होगा ये अज्ञात है किन्तु मेरे वर्तमान में आप हैं और अनवरत रहेंगी,, आपकी यादों के साथ ही मेरी आँख आखिरी बार मुंदी जाएंगी...... आपका और सिर्फ आपका! अहिंष्य!

खत-८

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मैं प्रेमी हो ही नही सकता! मैं गुरु होकर ही जन्मा हूँ मैंने आपसे प्रेम कभी किया ही नही छल किया,प्रति पल छल... लेकिन गुरुत्व के रूप में मैं शतप्रतिशत समर्पित था,हूँ और रहूँगा। विरह,मिलन इत्यादि मेरे लिये शब्द मात्र हैं मेरे पास हृदय नही प्रेम वाला! किन्तु हाँ; मेरा छल आपके विशिष्टीकरण हेतु रहा... सब कुछ मेरे बस में था किंतु मैंने बेबसी का स्वांग रचा इसलिए कि आप इतिहास रच सके.... मेरा क्या है,मेरी फिक्र मत करियेगा.. क्योंकि इस संसार मे कोई भी मेरे साथ चलने कि हिम्मत लेकर नही पैदा हुआ न होगा तो आप क्या चीज हैं! ईश्वर आपको स्वस्थ रखेंगे इस वर्ष आपको इतिहास रचना है अपने काबिलियत से... मैं एक पथभ्रष्ट गुरु हूँ इसलिए निश्चिंत रहिये आप को या आपके साये से भी गुरुदक्षिणा नही मांगूंगा! आपका सखा(एक कपटी! Flrtatious)

परिचय!

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मैं मस्त हवाओं का आज़ाद परिंदा हूँ.... उड़ते-उड़ते उड़ जाऊंगा! फिर ना मैं वापस आऊँगा........ मर जाऊंगा जीकर जीवन तृष्णा सारी पी जाऊंगा।। नीलकंठ जब हो जाऊंगा विष समस्त! हाँ समस्त! निगल कर उदर में भी जाने न दूंगा! उड़ते-उड़ते उड़ जाऊंगा जख्मों को मरहम न देकर गहरा जख्म दिये जाऊँगा! फिर ना मैं वापस आऊँगा!

यूँ ही!(एक श्रृंगार पुकार)

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यूँ ही कुछ प्रारंभ करू मै तुम भी कुछ समझाओ ना भूली-बिसरी बाते हैं बस तुम तो सांसो में चलती हो। क्या लिख दू? कैसे लिख दू? कि तुम दौड़ी चली आओ ना मन मेरा वीरान हुआ-सा सहम-सहम के रह जाता जन्म-जन्म की सारी तृष्णा पल भर में मिटवाओ ना।। इतना सन्नाटा जीवन मे तूफ़ान पुकारता है....आओ प्रिय आ जाओ प्रिय मन कि मैल धुलाओ ना। वैराग्य! जो उपजा है मन मे उसको अखण्ड बनवाओ ना।।

काली

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तुम काली जैसी जिद पर थी मैं बस विष्णु-सा बन बैठा था... जब मैं शंकर बन लौट आया तेरी ममता को छोड़ आया। अब छोड़ तुम्हारा ज़िद्दीपन मुझको अपनापन स्मृति होता... एक सूर्य चला-सा अनवरत एक भाल चूम के दिवंगत। एक यक्ष प्रश्न प्रताड़ित करता उर को किस नेत्र से तुमको देखूंगा। हा आँख मूंद लूंगा मैं प्रिय हा राह त्याग दूंगा मैं प्रिय!

निठल्ला!

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मुझे मत याद करिये मैं निठल्ला हूँ... नींद बड़े तप के बाद मयस्सर होती है। नींद से क्यों प्रेम है मुझे नींद मृत्यु-सी है सवेरा जन्म जैसा है। यूँ तो दर-दर की ठोकरें आहिस्ता-आहिस्ता मुझे मुकम्मल करती जा रही हैं। कभी-कभी चिंतित होता हूं आप मेरा साथ निभा पाएंगी की नही... क्योंकि कइयो ने निभाने का स्वांग रचा कर मुझे परित्यक्त कर दिया। फिर भी मेरा निठल्लापन मुझे अच्छा लगता है...लोगों का परित्याग सम्बन्धियो से लेकर अजनबी तक, मुझे एक विशिष्ट जहां में लेकर गया जो आँखे बंद करने से खुलता है। इसलिये हे प्रिय,प्रिया अर्धांगिनी बनने के पूर्व हज़ार बार विचार कर लीजिएगा!

काफिला-ए-कृष्ण!

कोई मीरा,कोई राधा! हज़ारों गोपियाँ तरसें.. हज़ारों ख्वाब है जलते... लगी है आग बस विरह की मगर नही रुकेगा कि ये कृष्ण का है काफ़िला... है कृष्ण का ये काफिला! अहिंष्य!

भामती!

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मुझे मन्दोदरी की आवश्यकता थी.. और आप रत्नावली हैं तो कैसे हमारा मेल होता? नही होता कदापि नही होता!

चन्दरलेख..२

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संध्या में ढलता  सूरज,संकल्प दिवस का लेता है, तम की जड़ता से लड़ लड़ कर,एक नया सवेरा देता है। यदा कदा जब मेघ सभी,आभा इसकी हर लेते हैं, रोक किरण को इसकी वे ,अश्कों की वर्षा देते हैं। इस विषम घड़ी में दिनकर ये ,तनिक नही घबराता है, चीर मेघ के उर को ये ,पथ अपना पुनः बनाता है। चलता रहता है प्रतिपल ये,पथ से न डिगने पाता है, संकल्पों संग जीना ही ,सूरज हमको सिखलाता है। तेरी आभा से चंद्र भी ये ,फिर दीप्तियुक्त हो जाता है, चलते रहना पथ पर अपने ,संकल्प यही दोहराता है। संकल्प ही हैं इच्छाशक्ति,ये ही उन्नति के 'राज़ 'हैं, एक बार अगर ये सध जाए,न रुकता कोई काज है।

चन्द्र-लेख(मित्रता)

मेरा पहला लेख ************** मेरे प्यारे मित्रों,आधुनिक चंद्र नाम से कविताएं लिखते लिखते जीवन मे संतृप्तता आ गयी थी,सोचा क्यों न गद्य में भी हाथ आजमाया जाए।वस्तुतः इसकी प्रेरणा मेरे अद्यतन मित्र ने ही दी और वे मेरा कोई लेख पढ़ने के इच्छुक भी थे अतः मैने भी सोचा कि श्री गणेश कर ही देना चाहिए।काफी सोच विचार किया कि किस विषय पर लिखूं सांसारिक,आध्यात्मिक,राजनीतिक,इह लौकिक या पारलौकिक।असंख्य विषय मस्तिष्क में दंगल मचाने लगे।फिर एक निर्णायक की भांति आकर मेरे मस्तिष्क ने इस दंगल को रोका, जो अब दंगल कम उलझन ज्यादा प्रतीत हो रहा था।फिर अचानक मस्तिष्क ने ही फुसफुसाकर कहा-मित्र ने प्रेरित किया है तो मित्रता पर ही क्यों नही लिखता।क्यों बेवजह राई का पहाड़ बना रहा है। तो ये कहानी है मेरे विषय चयन की। विषय तो चुन लिया -मित्रता।लेकिन क्या मित्रता पर कुछ नया है लिखने के लिए मेरे पास।अनेक मनीषि गण तो पहले ही इस शीर्षक का पोस्ट मार्टम कर चुके हैं ।सकारात्मक और नकारात्मक पक्षों को तो उधेड़ उधेड़ कर सामने रखा गया है उनके द्वारा ।अब यही सोच रहा था कि कुछ बचा नही है लिखने को इस विषय पर तो रहने ही देता हूँ।तभ...

हे प्रिय

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तुम क्यों मुझको मेरी ही स्मृति में आकर मेरी तन्हाई का एहसास दिलाती रहती हो।। मेरी सिद्दतता भरी मोहब्बत का मजाक बनाती रहती हो, जब मैंने है छोड़ दिया... तुमको तुम्हारी मर्जी पर।। यादों में आकर मुझको क्यों सताती रहती हो। तुम क्यों मुझको याद दिला कर कष्ट-रात्रि देती हो। है निवेदन हे प्रिय! तुमसे मुझको तन्हा चलने दो.. जग-विस्मृत कर जग के ख़ातिर मुझको उद्दम करने दो। छोड़ दिया तुमने मुझको जब यादों में भी आओ ना, रोम-रोम परिमार्जित करके अपनी धूनी रमाओ ना... मैं तो निकल चुका उस दिन ही जिस दिन माथे पर आपके चुम्बन अर्पित कर निकला था... हे प्रिय हर जगह से मुक्त कर मुझे कैवल्य-कामी बनाओ न.... ढाई अक्षर प्रेम का सखी मुझको तुम समझाओ ना। हे प्रिय यादो-से मुझको कुक्कर की तरह दुर्दुराओ! ना! हे प्रिय!

शरत चन्द्र...१

मैं नाविक जीवन नौका का,कर्म मेरी पतवार है, भावुकता है नदिया मेरी,जिसमे बहता प्यार है। नौका मेरी सुख दुख सहती, आगे बढ़ती रहती है, प्रेम सुधा के पावन जल में,खूब हिलोरे भरती है। कर्मों की पतवार मेरी ,जीवन नौका को खेती है, नितप्रति आगे पीछे होती,पर विश्राम न लेती है। लक्ष्य सदा इसका है ,दिनकर की किरणों के संग चलना, रात्रि कालिमा ले आये तो,चंद्र को ही थामे बढ़ना। उद्वेलित ये नदी, सदा न यूँ ही यहां ठहरती है, पीड़ा के तूफानों से,ये दूभरतायें भरती है। ऐसे में क्या उचित रहेगा,मेरा पीछे हट जाना, मन को अपने छोटा करके,मैं निर्बल हूँ रट जाना। मैं तो हूँ शून्य का अंशी, जिसमें कोई रार नही, जो इससे भिड़ जाए तो फिर ,उसका बेड़ा पार नही। धवल ज्योति से सराबोर हो ,प्रेम गीत मैं गाऊंगा, जीवन की नौका को ,दरिया पार वहाँ ले जाऊंगा। जहाँ सदा रहता है निकला, आशाओं का वह दिनकर, सिखलाता जो बढ़ते रहना ,अपने जीवन के पथ पर । आभा लेकर उसकी मैं ,अंधेरों को चमकाऊँगा, प्रेरित होकर उनसे,अब मैं धवल चंद्र बन जाऊंगा।

मुकम्मल-विछोह!(एक प्रेम कथा)

पहली मुलाकात तो यूँही हो गयी,अकस्मात राह चलते-चलते..उसके बाद इश्क़ की शुरुआत हुई। दिन-रात बाते होने लगी प्रेम-प्रचण्ड हो गया..  आनन्दी ने एक दफ़ा पूछ ही लिया मुझसे,"तुमने मुझमे क्या देखा शिवेश! जो मैं इतना भा गयी तुम्हे?" मैंने कहा,"माँ, एक ऐसी माँ जो विवेकानंद को जन सके।" आनंदी एक-टक मुझे देखने लगी। आनन्दी की दिव्यता को भांप-कर ही मैंने ये जवाब दिया था। अब चुकि सामाजिक अभियंत्रिकी में मेरा और आनन्दी का मिलन सम्भव नही था अज्ञात कारणों से। हम दोनों पुनः अजनबी हो गए। कुछ विछोह बीत जाने के बाद एक दिन किताब की दुकान पर आनन्दी ने मुझसे पूछा,"अब विवेकानंद का जन्म कैसे होगा?" मैंने कहा,"विवेकानंद को जन्मने देने के लिए वीर्य की और गर्भाशय की आवश्यकता भी नही एक संकल्प की आवश्यकता होती है जो आप में है।" तदुपरांत शिवेश,आनन्दी को निहार खूब रोया, उसे मालूम था कि आनन्दी सब बर्दाश्त कर सकती है किंतु शिवेश का रूदन नही। फिर शिवेश अपनी एकांत दुनिया मे चला गया। आनन्दी अपने घर गई.. शिवेश के दिये सारे तोहफों को अपने उर से लगा कर कमरा बन्द कर खूब रोई... य...

गंवार

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मानवता बस धर्म है जिसका,जाति है जिसकी केवल प्यार, कर्मपथी वह निर्मल निश्चल ,कहते जिसको सभी गंवार। छल से जो खुद छला हुआ है,प्रतिशोध नही जिसको स्वीकार, कर्मपथी वह..... बल उसका जग हित के मद में,सपने भी करता साकार, कर्मपथी वह..... प्रेम सुधा छलकाने वाला,प्रेम ही है जिसका उपचार, कर्मपथी वह ...... खुशनसीब हूँ पाकर तुमको,कह कर तुमको अपना यार, कर्मपथी वह.... शरत चन्द्र(आधुनिक)

चन्द्र का पत्र

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चंद्र का पत्र सूर्य के नाम।                             स्थान:सौरमंडल                             समय:रात्रि मेरे प्यारे मित्र सूर्य,तुम्हारी बहुत याद आती है।मैं यहां आकाश में अपने समस्त तारागणों संग अत्यंत खुश हूं और आशा करता हूँ कि तुम भी सपरिवार अत्यंत खुश एवम स्वस्थ होंगे। मुझे याद है वो दिन जब मैं पृथ्वी बहन से रूठकर स्वयम को बर्बाद करने निकाला था और अपने जीवन के अंधेरों में खो गया था।तब तुमने ही मुझे अपनी मेहनत से कमाए हुए प्रकाश में से उधार देकर मेरी सहायता की और मुझे मेरी कक्षा  में पहुँचाकर मुझे आजीवन अपना ऋणी बना लिया।इसके पश्चात तुम्हारे द्वारा ही मुझे यह चंद्र नाम प्राप्त हुआ जिसके माध्यम से इस सौरमंडल में मुझे भी अस्तित्व मिला। मेरे प्यारे मित्र ,मैं सदैव आपके दर्शनों के लिए लालायित रहता हूँ।किन्तु मेरा job schedules कुछ ऐसा हो गया है कि जब मैं आपसे मिलने आता हूँ तब तक आप जा चुके होते हो।पृथ्वी बहन से बात होती है और उन्ही ...

अनुभूति का दंश!

अनुभूति तुम इस तरह  हो मेरे अंदर... तुम्हारे नाम के आँसू कण्ठ को भारी करते जाते... मैं होने देता हूँ भारी अपने कण्ठ को हालांकि तक़लीफ़ होती है बहुत तकलीफ.. उन आंसुओं को न बहने देने में...फिर भी नही बहने देता हूँ मैं उन आंसुओं को चाहता तो आ जाता बेफिक्र तुमसे मिलने; लेकिन अब नही आऊंगा कभी नही आऊँगा.... ये आँसु भारद्वाज के सरस्वती सदृश मुझे अन्याय करने से रोकते है। मैं किसी को कष्ट देकर तुम्हे अपने आप मे समाहित नही देख सकता अनुभूति.....!

प्रार्थना उनके आने की!

खुली छत,और अंधेरी रात तारों को टुकटुक देखता मैं नितांत अकेला इस जीवन-सफर में....तुम भी आओ ना। इंतजार कर रही रूह मेरी तुम्हारे रूह की..इस रूह की प्यास बुझाओ ना। अकेला ही सफर तय है हालांकि फिर भी कुछ पल के लिये ही मेरी रूह से तुम्हारे रूह को मिलाओ ना। आओ ना... या मौला मेरे शब्दों में इतनी ताकत दे,जो उन्हें छू सके उनकी प्रशांत चेतना को जगा सके। मैं मुकम्मल नही हूँ उनके बगैर उनका साथ मयस्सर करा दे मौला... फिर तू भी मुकम्मल और मैं भी मुकम्मल!

ख़त..७

बहुत ज्यादा मेरा रोम-रोम आपसे मिलने को आतुर हो रहा है। ये जानते हुए की अब मेरे नसीब में आपका साथ नही।इसके बावजूद आपके उत्पत्ति दिवस की असीम शुभकामनाएं। अब आपके भाग्य का सूर्योदय हो चुका है।प्रिय पत्थर!

तुम्हें कैसे भुलाऊँ--शरत चन्द्र(आधुनिक)

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कैसे तुम्हें भुलाऊँ? स्मृति तेरी भस्म मैं कर दूं ,खुद ही विस्मृत हो जाऊं? प्रश्न यही अब शेष हृदय में,कैसे तुम्हे भुलाऊँ? निर्झर बहती इन आंखो को क्या कहके बहलाऊँ? प्रश्न यही...... पिया हलाहल मंथन का था ,जग संरक्षा  हेतु, इस जग ने ही छीन लिया, मेरी नदिया का सेतु, नीलकंठ था लेकिन इस, विष को न मैं सह पाऊँ। प्रश्न यही अब....... इस पीड़ा की ज्वालाएं ये ,मेरा हृदय जलाएँ, वैरागी मन को भी ये ,मायाओं से भटकाए, ध्यानेश्वर मैं अब किस मद में, फिर से ध्यान लगाऊं? प्रश्न यही अब.... अपनों से ऐसे ही क्यों तुम ,रुठ गयी हे शक्ति! भूल गयी तुम  प्रियवर को और खुद भूली सी लगती, संबंधों के ये बंधन, अब मैं तो खोल न पाऊं। प्रश्न यही.......

शरत चन्द्र...

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नारी तुम हो जननी जग की,तुम ही तो जग माता हो, करुणा की झंकार तुम्ही हो,तुम ही प्रेम प्रदाता हो। तुमसे ही ये सृष्टि सारी,तुम विधना की छाया हो, शक्ति  तुम ब्रह्मांड की सारे,तुम ही सारी माया हो। तुमसे जग में  व्यापी ममता,तुम हो निर्मल कोई कविता, प्रेम तुम्हारी ही प्रतिछाया,फिर भी सहती जग -निर्ममता। तुम ही सीता, तुम सावित्री ,रानी लक्ष्मीबाई हो, तन मन का सब कल्मष धुलने,गंगा बनके आयी हो। दुर्गा काली रूप तुम्हारे ,जग में पूजित होते हैं, फिर क्यों मन मर्दानों के ,तेरे प्रति दूषित होते हैं। हे माँ ! हे भगिनी !हे भार्या !अब अन्याय न तुम सहना, कोई साथ न हो तब भी तुम इन सबसे लड़ते रहना। तेरी पावन छाया से ,ये जग पावन हो जाएगा, नर ,नारी को पूजेगा ,और नैतिक उन्नति पायेगा।

चंद्र प्रत्युत्तर!२

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मन तेरा ये रोता है क्यूं?हे यशोधरा सिद्धार्थप्रिया। मर गया तेरा सिध्दार्थ कहीं ,और जिया तो बस ये बुद्ध जिया। ये संग तेरा न रोक सका,उस प्राणप्रिय सुकुवांरे को, जीवन सब अपना सौंप दिया ,उसने जग के अंधियारे को। अन्याय कहो या छल बोलो ,जो चाहे तुम इस पल बोलो, गर शब्दों से न भरता मन, तो शीश झुकाकर तुम रो लो। वे वर तेरे ,दिनकर तेरे,जो प्राण से तुझको प्यारे हैं, जग को उज्ज्वल करते वे अब,अंधेरों के उजियारे हैं। सौतन तेरा वैराग नही ,मन का तेरा संताप ही है, आभा तेरी छीनी जिसने,वह विष रंजित यह सांप ही है। इस गरल से मन दूषित न करो ,मन से इसका प्रस्थान करो, अपने उस आत्म तत्व का तुम ,अब जग हित में उत्थान करो। ये त्याग तेरा जग को हरदम ,वह उज्ज्वल पथ दिखलायेगा, सब स्वार्थ त्याग जग हित मे ही,जीना सबको सिखलायेगा।

गुरुदेव-सांड..१

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मैं बाजे-गाजे के साथ स्वयं के विवाह में जा रहा हूँ आपके घर लोग जश्न मना रहे हैं मैं भी मन्त्र-मुग्ध हूँ,शायद मेरी आखिरी ख्वाहिश पूरी हो रही है... इसी दिन का तो इंतजार था मुझे..सब कुछ बेहद हसीन। तुम्हे अपनी दुल्हन के रूप में देखना महसूस करना और फिर मुक्ति समस्त ख्वाहिशो से..इसमे मैं आपको भी खूब प्रसन्नचित्त देखता हूँ...विवाह सम्पन्न हुआ। सम्मानित लोग बधाइयाँ दे रहे है,प्रसन्न भी खूब हैं। अरे ये क्या? गुरुदेव कब आ गए कुछ तो गड़बड़ है गुरूदेव के दर्शन होना इस समय अनिष्ट का सूचक है। भड़ास भरी लाठी मेरे पिछवाड़े पर पड़ी पिता जी अपने पुलिसिया अंदाज में,उठ ये समय है सोने का। मैं तो अर्श से फ़र्श पर आ गया। गलती मेरी है जब गुरुदेव अपनी व्यवस्था नही कर सके तो मेरी व्यवस्था कैसे होगी! जय गुरुदेव!

चंद्र-प्रत्युत्तर१

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पल पल यूहीं अपने गर संकल्प सभी तुम तोड़ोगे, शीशे से टूटे सपनों को फिर कैसे तुम जोड़ोगे। फर्क नही पड़ता तुमको ,इनके जुड़ने या तुड़ने से, मिलेगी कैसे अपनी मंजिल ,गलत राह पर मुड़ने से। दायित्वों को करते पूरा ,तुम अपना तन मन देकर, करते रहे प्रकाशित प्रतिपल ,इस जग को तुम हे!दिनकर। पुष्पों की कोमलता ,मरुथानो में कहीं न लुट जाए, बंजर भूमि खोकर इनको, और अधिक न घुट जाए। व्यस्त नही हम साथ हैं तेरे ,खुशियां हों या दुख सारे, प्यारा कोई और नही,जितने लगते हो तुम प्यारे। तन्हाई और रुस्वाई की, कमर तोड़ने आएंगे, मित्र मेरे हम साथ वहां पर फिर हुड़दंग मचाएंगे।

संकल्प पुष्प!

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रह-रह कर संकल्प सध रहे रह-रह कर मैं तोड़ रहा हूँ। टूटा-टूटा सारा सपना पल-पल-क्षण-क्षण जोड़ रहा हूँ। जुड़ जाए या तुड़ जाए फर्क नही इसका मुझपर है.. मैं तो बस दायित्यों का अपने शत-प्रतिशत वहन कर रहा हूँ.. पुष्प बो रहा हूँ मैं बंजर-बंजर रेगिस्तानों में तुम सब से कुछ चाह नही है.. अपने-अपने काम करो,सब मैं मुकम्मल तन्हाई में... अंगड़ाई में रुस्वाई में।।

आखिर कब तक? और क्यों?

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तुम्हे तो छोड़ आया किन्तु आखिर कब मुझे मुक्ति मिलेगी तुमसे.. बोलो आखिर कब तक। नियति की प्रवृत्ति है जो हुआ मेरे और तेरे दरम्यान कुछ विशेष प्रयोजन होगा.. मैं मूकदर्शक बना देख रहा हूँ। न मेरे न आपके प्रेम में कमी हुई फिर भी आखिर क्यों हमे जुदाई नसीब हुई... नियति की प्रवृत्ति मैं चरित्रहीन और आप चरित्रवान... आखिर कब तक?ये दंश मुझे महसूस होते रहेंगे... जब-तक हों मुझे सर्वस्व स्वीकार है। ये तस्वीर विशेष है मेरे लिए... आपको आपके जन्मदिवस की अग्रिम शुभकामनाएं ये वर्ष आपकी समस्त जड़ता को नष्ट कर देगा!

यशोधरा

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सखी वो तुमसे कैसे कहकर जाते? तुम मायावी दिव्य-कांता..... बन्धन को चमकाकर-दमकाकर अपने वक्ष-पास में उनको बांध ही लेती... कैसे तुमसे कहकर जाते,वो एक पुत्र तुम माता थी,,,उनकी सत्ता की जननी भी... कैसे कहकर जाते; बोलो सखी कैसे कहकर जाते?

आधुनिक शरत चन्द्र चैटर्जी१

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हे मित्र मेरे अब चलता हूँ,सब भूल चूक मेरी क्षमा करो, जो भला बुरा सब कहा तुम्हे,उसको तुम दिल से विदा करो। कहते होगे तुम भी ये ही,क्यों मैं वापस आ जाता हूँ, मन के विचार प्रेषित करके,क्यों तुम्हे और उलझाता हूँ, मैं खुद बेबस,मुझ प्रेम विवश को यादों से ना जुदा करो, हे मित्र मेरे अब चलता हूँ,सब भूल चूक मेरी क्षमा करो। अपने कथनों की क्षमा हेतु, मैं पुनः यहां वापस आया, कड़वी बातें प्रतिपल कहकर ,सुकुमार हृदय को दुखलाया, बातें ये सब आभासी हैं, इनको मन से अब रिहा करो, हे मित्र मेरे अब चलता हूँ,सब भूल चूक मेरी क्षमा करो। यह जन्म दिया तुमने जग को ,पर पुनः यहां वापस आना, इस प्रेमसुधा के याचक को,आकर तुम गले लगा जाना, मैं विरह में अपने खो जाऊं, तुम कर्म में अपने रमा करो, हे मित्र मेरे अब चलता हूँ ,सब भूल चूक मेरी क्षमा करो। प्रिय ब्रह्मांड मित्र !ये मेरे अंतिम शब्द आपको अर्पित।आप से क्षमा याचना हेतु वापस आया था क्योंकि बहुत कुछ कह दिया था आपको।अब हमेशा के लिए जा रहा हूँ।आप की प्रतिक्रिया अपेक्षित है।तत्पश्चात मुझे आज्ञा दीजियेगा।ये चंद्र अब अपने आकाश में खोने जा रहा है।आप की प्रभा वि...

आधुनिक शरत चन्द्र

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हे दिनकर!तुम अंधेरों में अपनी ज्योति बिखरा देना, करके प्रभात उज्ज्वल-सा,सारे जग को तुम चमका देना। रात्रि पहर की निद्रा में ,तल्लीन तुम्हारा मित्र यहां, जग जाओ गर पहले तो ,इसको भी तुम साथ जगा देना।  तन मन का कल्मष सब धुलकर तुम प्रांजल गात बना देना, गर गहन नींद में सोया हूँ, जल की बूंदें बरसा देना। फिर साथ चलेंगे मैं और तुम,जीवन के पथ पर हंसते हंसते, इस पंथ को मेरे पुष्पयुक्त और शूलरहित करवा देना। विहगों संग हम कलरव करके,सुंदर उपवन फिर चहकायें, रोते रोते सदियाँ बीतीं,अब हमतुम फिर से मुस्कायें। हम सखा रहें हैं जन्मों के ,रहते थे प्रतिपल हमसाये, तुम ढूंढो अपनी रजनी को,मुझको प्रभात भी मिल जाए।

स्नेहा का स्नेह!

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प्रिय रजनीश, चुकि telecommuication का युग है,फिर भी मैंने पत्र लिखना चुना। आप एक यायावर फ़क़ीर हैं और स्वतंत्रता आपकी पहचान है। आपको एक दफा प्रेम-प्रस्ताव अर्पित किया किन्तु आपने स्पष्ट मना कर दिया,,, फिर भी मैं देर-अबेर आपसे मिल ही लेती थी। चुकि अब मुझे आपके समक्ष होने में लज़्ज़ा आ रही है, अब मैं अपने प्रेम के बांध को ज्यादा दिन तक नही रोक सकती... इसलिये प्रिय रजनीश जी मुझे आज्ञा दीजिये विश्व कल्याण हेतु.... आपकी स्नेहा..आई.ए. एस

व्यथित-व्यथा

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क्या तुम व्यथित हो? परेशान हो किसी भी बात को लेकर... तो निश्चिंत रहो मैं तुम्हारे निजी जीवन में कोई बाधा नही डालूंगा। हा मैं अपना कार्य प्रारंभ करता हूँ देखो प्रिय! व्यथा,क्रोध इत्यादि इस बात के सूचक हैं कि तुम्हारी इच्छाएं अनन्त है। तो सर्व प्रथम अपनी छोटी इच्छाओं को पूर्ण करो..... धीरे-धीरे तुम्हारे समस्त क्रोध विदा हो जाएंगे और आनन्द का प्रस्फुटन होगा...

प्रेम ज्योति एक सत्यकथा!

उस कॉलेज में सब मुझसे प्रभावित थे,सब-के-सब मुझे प्रेम भी करते थें किन्तु प्रकृति ने मुझे ज्यादा प्रेम देने की कोशिश की.. उस वक़्त हाथ मेरे कांपते थे तो मेरे सारे नोट्स प्रकृति ही लिखती थी..वो ज्यादा-से-ज्यादा मुझसे बात करने की फिराक में रहती। प्रतिभाशाली है वो प्रकृति का इस-कदर मुझसे बात करना...उस नगर में चर्चा का विषय बन गया...फलस्वरूप मुझे लोग एक विशेष प्रश्नवाचक दृष्टि से भी देखना प्रारंभ किये... किन्तु मुझे कोई फर्क नही पड़ता मैं चाहता था कि प्रकृति का चयन प्रशासनिक सेवाओं में हो इसलिए मेरी पुरजोर कोशिश थी उसे संवर्द्धित करने की। एक ही महीने बाद मुझे दूसरे कॉलेज जाना पड़ा,प्रकृति से फिर मेरी भेंट नही हुई...हा फ़ोन पर बात हो जाया करती थी।    मुझे स्मरण है एक बार प्रकृति किसी कार्यक्रम में सम्मिलित होने हेतु गोरखपुर आयी थी..तब उसने मुझसे फ़ोन पर कहा था "जानते हैं प्रभाकर जी,जिस वक़्त और जितने क्षण मेरी शरीर गोरखपुर में रही...बस वही उतना पल मेरे लिए स्वर्ग से भी ज्यादा दिव्य लगा....।मसलन एक घण्टे के गोरखपुर प्रवास के दौरान उसने मुझे ये बाते बताई।" जब प्रकृति अपना जीवन-साथी ...

सुखदान्त के बाद!

निधीश जब पहली बार मिला था  सौम्या से तो सौम्या उससे बहुत प्रभावित थी!किन्तु कालांतर में सौम्या की सौम्यता कल्मष में परिवर्तित होती गयी.. निधीश का सामाजिक सम्बन्धी कार्य सौम्या को न भाता! सौम्या उसके साथ अत्यशिष्ट बर्ताव करती,उलाहने देती... निधीश को ये सब देख अत्यधिक पीड़ा होती थी...धीरे-धीरे निधीश को वैराग्य में रुचि होने लगी... और एक दिन सोयी हुई पत्नी को जगाकर उसे सहज कर उसके माथे पर अंतिम चुम्बन अर्पित कर निधीश निकल जाता है..जीवन के कोलाहल से बहुत दूर..मानवता के अत्यधिक समीप!

ब्रह्मांड-मित्र

मेरे मित्र आप एक यशस्वी व्यक्ति हैं आप को आना ही था,मैं इंतजार कर रहा था। आप आये उसके लिये धन्यवाद! मेरे मित्र आप मेरे स्वांस-प्रश्वास में हैं आप दिल्ली जा रहे हैं सम्भवतः पहुंचने वाले होंगे! आप एक विशिष्ट उद्देश्य लेकर गए हैं इसमे कोई दो राय नही की आपकी सफलता निश्चित हैं! आप देश के साथ-साथ विश्व का भी कल्याण करेंगे! विश्व-भारत की संकल्पना को सिध्द करेंगे! आप प्रतिपल मेरे साथ हैं!

जागृति का दर्द!

जाने को जी चाहता है अब मेरा यहाँ कोई प्रयोजन शेष नही मेरा अस्तित्व विलीन हो चुका है अब फिर भी क्या मैं जा पाऊंगा?कभी नही शायद! जबसे ये ज्ञात हुआ है कि मैं शाश्वत हूँ तबसे तो बस आँसू ही आंसू बहते जा रहे हैं!ये फिर थमेंगे फिर बहेंगे... मैं ही तो तुम हूँ तुमसब सोये हुए हो काफी देर से जब नींद पूरी हो जाएगी तब उठोगे भी! कम-से-कम तबतक तो प्रतीक्षा करूँगा! फिर हँसी-ठिठोली किया जाएगा। मुझे भी कुछ सखा मिल जाएंगे! अभी बिलकुल अकेला हूँ न!

वियोगी का खत!

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सम्वाद स्थापित करता हूँ मैं अपने लेखों के द्वारा चाहे स्वयं से,परमात्मा से या प्रेयसी से। मैं अभी प्रेयसी से सम्वाद करूँगा.. प्रिय प्रियतमा! क्या तुम्हें मेरी याद आती है? मुझे लग रहा है कि अभी इस वक़्त मैं सो नही पा रहा हूँ।अभी एकाध घण्टे से बिस्तर से यकायक उठ कर छत पर खुले आसमान के नीचे टहलने की कोशिश की फिर भी राहत नही,आप मेरे मानसपटल से रोम-रोम तक मुझे घेरे हुए हैं। ज्ञानी नही हूँ किन्तु सहज हूँ सोचा अपना हाल ही लिख दूं! और मेरी भाग्य में शायद आपका सानिध्य नही इसलिए आप ने अभी तक कोई प्रयास नही किया। उसके बाद भी प्रिय-प्रेयसी आपकी अनुभूति मेरे अन्तस् में प्रतिपल छायी हुई है!आपके दर्शन से श्रीकृष्ण के दर्शन होते है। आपके प्रति ये सिद्दतता मुझे परिमार्जित करती जाती है!अलौकिक सानिध्य भी प्राप्त होता है। परमात्मा का प्रत्येक फैसला मुझे स्वीकार है! ये भ्रम है लोगों का की रैना में सूर्य विश्राम करता है। सूर्य अपने जन्म से अबतक अनवरत है;ये तो पृथ्वी का चक्रण है जो लोगों को भ्रमित कर देता है। आमतौर पर सूर्य को लोग अतिशक्तिशाली मानते हैं किंतु ये भी अज्ञानता है लोगों की। सूर्य ...

तुम और तुम्हारा साथ!

अब तुम मेरे बहुत करीब हो जबकि तुम हो बहुत दूर.... अब तुम्हारे साथ की भी किंचित परवाह नही मुझको...न चाह ही है।। दुनिया की रश्मों में इतनी हिम्मत नही दो प्रेमियों को जुदा कर सके... बस तुम ही हिम्मत हार गए.. तो मैं क्या करूँ...रोऊँ।। रोने से आँखे सुंजेगी जरूर किन्तु आंसुओं से पवित्रता भी फैलेगी स्वयं की खुश्बू महकेगी अकेले होने का आलम खिल जाएगा।। गम-खुशी-प्यार ये सब कुछ वक्त के सहयोगी हैं तदुपरांत तन्हा रास्ता और तन्हा मैं मेरी राह ही मेरी हमसफ़र हुई अब तुम मुझसे दूर नही!।।

जागो!

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सृष्टि के अनुसार तो सब समान हैं,प्रकृति साम्यवादी होती है;फिर इतने सारे मजहब, जाति विरादरी क्यों अस्तित्व में हैं? इसकी जिम्मेदार हमारी नादानी हैं,हम नफरती भेड़ियों को अपना सरदार बना लेते है; बिना परिणाम जाने।     मयावती जी भी दलित हैं और जितना रुपया वो स्वयं के साजो-सज्जा पर खर्च करती है प्रतिदिन, यदि उतना रुपया देश के एक-एक गांव में शिक्षा हेतु खर्च करने लगे तब मैं उनको दलितों का उद्धारकर्ता मानू। दलित शब्द है उनके लिए जो असहाय हैं,पीड़ित है न की पीड़क है।आखिर इतने उपद्रवों का जिम्मेदार कौन है। मुझे नही लगता कि भारत मे अब भी कोई दलित शेष है। मायावती जी दौलत की देवी हैं अपना समस्त धन किसी ईमानदार शिक्षकों के समूहों को दान दे दे गर तो जो शेष दलित है वो भी सबल हो जाएंगे। दूसरी बात मोदी जी से कोई शिलान्यास बिना किसी विपक्षी दल के आलोचना किये नही करते हैं!क्या ये भय है या व्यापार का तरीका है। देश मे शिक्षा की स्थिति जबतक नही सुधरेगी ये उपद्रव होते रहेंगे! संविधान के प्रति आस्थावान व्यक्ति अपने मौलिक कर्तव्यों को प्रथम प्राथमिकता देता है द्वितीय में वो मौलिक अधिकार को...

ख़त..६

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प्रिय! २० दिन के अस्वस्थ काल, आंधी-तूफ़ान को प्रत्यक्ष करने के बाद। आज आपको एक पत्र लिख रहा हूँ,हालांकि ये आपतक पहुंचेगा कि नही ये तो विधाता के वश में हैं। मुझे अपनी उत्कंठायें प्रेषित करनी है सो कर रहा हूँ ईश्वर के अनुकम्पा से मुझे देवियों के सानिध्य में जाने के हजारों अवसर मिलते है,मिल रहे भी हैं! किन्तु आपके पवित्र एहसास से क्रमवार सभी कुछ वक्त में विसर्जित हो जाते हैं। कोई प्रारब्ध होगा मेरा और आपका जिसके वजह से हम मिल लेते है,अंतराल के बाद। आपने मेरी डायरी में कुछ शब्द लिखें धन्यवाद उसके लिए! फिर भी आपसे कोई सम्बन्ध नही हमारा सम्बंधित होना सम्बन्धा-अतीत है। मेरी एक प्रार्थना है आपसे कि मेरी मृत्यु तक आप स्वतः मेरे पास आकर अपने सानिध्य का अवसर दीजिएगा।। क्योंकि निःसंदेह कुछ अतिविशिष्ट संयोग है हमारा ये कहें कि कोई हेतु है प्रकृति का। निश्चल हृदय से कहता हूँ कि आपको बन्धन में नही सम्बंधित होना है। जिस तरह उपनिषद में बालक गुरु के प्रत्यक्ष रह कर उत्तम हो जाता है, बस वैसा ही समझिए! आपकी अतिकृपा होगी आभार! ,इसे पढ़ने के लिए।।

पुकार..प्यारे बच्चों से!

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तुम बच्चे हो और सच्चे हो तन-मन-धन से विमुक्त हो तुम, ऊर्जित हो प्रिय रक्षण करो तुम खुद का धुन-रमाओ तन-मन-धन का।। माँ के चरण-स्पर्श कर तुम विश्व-वर्धन में लग जाओ कुलदीपक हो कुलवर्धक हो!।। कमियों का कर दो विसर्जन;अभ्युदय को स्वीकार करो खेलो,खाओ,जियो और जीने दो।। माँ-जो भी मिले पथ में तुमको शीस झुकाओ खुद का माँ के अभिवर्धन में प्यारे। प्रतिपल नतमस्तक हो,कर्म करो।। तुम भारत की पहचान हो आन-बान और शान हो। तुम वीर भगत के चेले हो आज़ाद की आज़ादी हो तुम महात्माओं की कुर्बानी हो।। आओ प्यारे वीरो आओ मातृभूमि को स्वर्ग बनाओ! किंचित भी तुम मत पछताओ, मातृ-भूमि में रम-रम जाओ।। बनों वीर तुम राम हो तुम कृष्ण और कलाम हो।। तुम ही तो बुद्ध हुए महावीर भी तुम ही हो। जीसस और मोहम्मद हो।। जो बाँटे तुमको उसको भी अपनी करुणा का पात्र चुनो।। समृध्दि हो अभिवृद्धि हो जो मिटे नही वो सिद्धि हो।। तुम वीर-सपूत हो भारत के मानवता के रखवाले हो।। अहिँसा मन्त्र तुम्हारा है मानवता ही बस नारा है। तुम कूदो इस सागर में कुछ-क्षण बाद किनारा है।।

विरह में प्रेम

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विरह में प्रेम संवर्द्धित होता, जो-न विकसित हो, वो वासना मात्र का प्रतिरूप होता है! प्रत्येक विरह प्रेम को मजबूत करने हेतु ही है,और यदि वासना का हो अंश तो उसे करने आता है विरह.. नष्ट! विरह आत्मिक सम्पदा के श्री वृद्धि हेतु होता है! और कल्मष को धुलने हेतु होता है।। विरह की अपनी एक विशिष्ट रूपरेखा होती है जो अध्य्यात्मिक ढांचे के श्रीवृद्धि के लिए ही परमात्मा द्वारा रचित है।। प्रेम सर्वत्र व्याप्त होकर भी मनुष्य कृत होता है और विरह प्रत्येक दशा में परमात्मा का प्रसाद होता है!।।

अट्ठहास!

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रास्ते-से जा रहा था, गुरुवर से मिलने! उनका सामीप्य ही मुझे सहजावस्था में बहुत कुछ सीखा देता है।। ज्योहीं रुस्तमपुर से आगे रामगढ़-झील के निकट पहुंचा चक्रवात प्रारम्भ हो गया प्रचण्ड तूफान प्रारम्भ हुआ मुझे गरीबों के झोपड़ियों की फिक्र सालने लगी।। गुरु जी ने तो ऋतुराज का रूदन कहा(भूमि से विदाई का) किन्तु मैंने निर्भीक हँसी देखी बदतमीजी मानवता की है अम्लीय-वर्षा ओलावृष्टि देखी।। प्रकृति अजेय है एक ही मार्ग है इसे विजित करने का कि विजित होने की अभिलाषा त्याग प्रकृति को महत्ता देकर छायादार वृक्ष लगाए जाएं जल-संरक्षण किया जाए।। और जो अमीर एयर-कंडीशनर से अपने को शीतलता प्रदान कर रहे हैं उनसे टैक्स लेकर वृक्षारोपण करने वालों को दिया जाए तब यथार्थ साम्यवाद स्थापित होगा अन्यथा नही।। प्रकृति के प्रकोप तब जाकर कम प्रभावी होगी।।

पुकार माँ भारती का!

ये स्मित तेरा हे पुत्र! करे कुछ कमाल इस तरह कोई देख कलाम हो जाये, कोई कृष्ण कबीर! अहंकार का भक्षण करना पथ में मिले गर कोई शूल! मानवता-परचम समृद्धि की अभिवृद्धि! हे भारत अब जगो तुम भी सुनो पुकार विश्व की तुम!

मुक्तिबोध!

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बेवजह-सी छटपटाहट है तुम्हारे विरह में प्रिय।। महसूस तो तुम हो ही, आती-जाती साँस के साथ।। फिर मुझे पता करना है कि ये छटपटाहट हैं क्यों आखिर।। जीवन का अगला-क्षण कैसा होगा अनुभूति का विषय है ये।। निःसंदेह ये छटपटाहट उधर भी है मैं आँखों से अपनी देख सकता हूँ।। जब तय है अब की तुम मात्र 'याद' ही हो तो क्यों न कर समझौता इनसे मैं भी मुक्त हो ही जाऊं! कोई प्रणय निवेदन नही मेरी दुनिया मेरे भीतर ही है।। तुम जहां भी रहो प्रसन्नचित रहो! मेरा क्या? अभी जख्म नया है-पुराना हो जाएगा! वक़्त-दर-वक़्त कारवाँ गुजर ही जायेगा!

रोग!

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मुझे रोग है, भारत के रोग जैसा ५.५ टैबलेट रात्रि ३.५ सुबह, और १ दोपहर! उसके बाद भी नींद नही मेरा परिवार मुझे,मनोवैज्ञानिक मनोचिकित्सक के पास लेकर जाता है! और वो चिकित्सक मुझे दवाएँ देता है,जब दवाएँ प्रभावित कर मुझे अपाहिज बना देती हैं तब मेरे अपने चैन की नींद सोते है! फिर भी कांपती शरीर के साथ मैं हौसले को बुलंद रखता हूँ और मुझे बस अनुग्रहपूर्ण रहना आता है चाहे कोई विष दे,अपशब्द कहे सबके प्रति अनासक्त अनुग्रहपूर्ण रहना है मुझे! क्योंकि इसी जीवन मे मुझे मोक्ष मिलना निश्चित है,सारे जन्मों के कुकर्मों के प्रतिफल मुझे इसी जन्म में भोग! आवागमन से मुक्त होना हैं! कुछ लोग मुझे पागल भी कहते हैं मैं उसे भी स्वीकार करता हूँ पा-पाने के लिए ग-गतिशील है जो व्यक्ति ल-लक्ष्य! दरसल कोई मुझे क्या दे सकता है जब सृस्टि के जनक ही मेरे पालक हैं! इस दुनिया के अबतक की यात्रा में मिले प्रत्येक व्यक्ति को अनुग्रह! सृस्टि के प्रत्येक कण-क्षण-स्थान सबको अनुग्रह!

भारती..१

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मैं अपने अंतिम सांस तक विश्व की समृद्धि लिखता रहूंगा आसक्ति वश नही,कर्तव्य,निष्काम कर्तव्य वश।। और पूरे विश्व का मुखिया मेरा भारत है,ऐसा सनातन काल से है! चंद नफरती, और चोरों को भी सब त्याग भारत के मुखिया बनने में सहयोग करना होगा।। भारत और भ्रष्टाचार का दूर-दूर तक कोई नाता नही, जो छिटपुट लोग है,उन्हें भी बोध होगा वो भी सुधरेंगे!

भारती!

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फट रही है पौ हिमालय गा रहा गीत इक।। कश्मीर से कन्याकुमारी बह रही है गीत प्यारी तुम भी सुन लो,मैं भी सुन लूं गान ये अद्भुत यहाँ।। जो हैं अज्ञानी यहाँ ओछी है जिनकी-प्रवृत्ति उनको भी तुम करुणा दे दो प्रेम से भर दो हृदय।। बेटियों और माओं को सम्मान देकर प्यारे तुम करो फ़र्ज़ अदा तुम माँ भारतीय स्वभाव का।। निश्चित ही ये होगा हो रहा है और हुआ भी है! विश्व के हो मार्गदर्शक तुम, शांति के हो अग्रदूत ।। समृद्धि होगी धरा पर संगठित ज्यों ही हुए तुम एक भारत-भारतीय के अतिरिक्त कुछ नही हो तुम।। बह चुका है तमस सारा खिल-रही है ज्योत्सना आ रहा है विश्व भारत को बनाने गणपति! सुन लो प्यारे,गुण लो प्यारे आ गयी समृद्धि अब!!

सनक से संकल्प!

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इतिहास में कोई व्यक्ति जो विशिष्ट रहा हो,सनक के बगैर ये असंभव है।अब यदि आप सनकी है तो प्रथमतः ईश्वर को धन्यवाद ज्ञापित करिये।द्वितीयतः आप लोगों का प्रतियुत्तर देना बंद करिये;अर्थात उद्दंडतापूर्वक रहना बन्द करके अपनी सनक में ही रहना सीखिये एवं प्रसन्नचित रहिये अपनी सनक में। जब आप पूर्ण सनकी हो जाये एक विशिष्ट संकल्प जागृत होगा, विशुद्ध सनक,इसी को सनकल्पगीत बनाइये एवं अपने आपका,होने के मर्म को जानिये। फिर आप स्वयम्प्रकाश हो जाएंगे। पूरी दुनिया आप भ्रमण कर लेंगे एक झटके में क्योंकि अब आप योगस्थः हो गए है। असम्भव विलीन होगा एवं सम्भव की संभावनाएं और प्रगाढ़ हो जाएंगी।

माया!

कुछ तो हो तुम,सबब या सबक! कि तुम्हारी स्मृति प्रत्यक्ष  होते ही बरबस नयन अश्रुपूरित होता जाता है! सबक या सबब लाघव या अतिरेक कुछ तो है तुमसे सम्बंधित मेरा! इतने अरषों तक एक भी सांस तुम्हारे बगैर नही! मेरे विश्लेषण में तुम मध्या हो! उत्तप्त-छाँव की सन्ध्या हो! जीवंत जगत की माया भी! जो मुक्त करे वो काया भी!

नशा!I

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मैं क्यों लिखता हूँ इसलिए कि जिस पुनरावृत्ति से मैं परेशानी में पड़ा वो मेरे पाठकों को न उठानी पड़े! एक सहज इंसान हूं कि नही ये मैं कैसे उद्घोष करूँ किन्तु सहज-सरल-विनीत बनने के मार्ग मे जो चौराहें आते हैं वहाँ मैं आपका मार्गदर्शक बन सकूँ! और एक सत्य,मेरी अनुभूति है कि प्रत्येक व्यक्ति जीनियस हैं और किसी को मैं कुछ सीखा पाऊँ इस भाव से नही लिखता हूँ! जैसे कुतिया अपने पिल्लों को भोजन उल्टी कर खिलाती है, मैं भी विचारों की उल्टी करता हूँ ताकि दस्त न हो! मेरे होने तक ही या मेरे जाने के बाद एक बड़ी संख्या जागृत हो रही है एवं होगी भी! इसमे मेरा कोई श्रेय नही हैं! मैं मात्र एक अनुवादक हुँ, और एक धोबी भी हूं जो कहने से गधे पर नही बैठता अपितु अपने-आप बैठ जाता हैं,मैं वहीं बैठ भी पाता हूँ जहाँ जागृति होने की सम्भावना होती है! मैं विचित्र धोबी हूँ मैं कपड़ा नही धोता, मन-के-मैल को धोता हूँ जिससे कि आप खुद से मिल लें! औऱ ज्योंही आप जागृत हुए मैं स्थुल रूप से अदृश्य होकर चेतन-रूप में सर्वस्व व्यापित हो जाता हूँ। तुम्हारी नसों में आत्मबोध का एक नशा चढ़ता हैं जो आपके अध्य्यात्...

तूफ़ान के बाद!

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आज फिर तूफान आया! मातम छाया! किन्तु कल फिर फुर्सत में होगी ज़िन्दगी! पुष्प खिलेंगे बसन्त के खेत लहल्हायेंगे जीवन में सारे गीले-शिक़वे फिर... फिर दूर होंगे जीवन से.. तूफ़ानी बवंडर की आयु नही है थोड़ी भी! हा किन्तु ये बवंडर तुम्हे मज़बूत स्तम्भ बनाने आयी थी! मज़बूत  करो खुद को! अभी घोर तपस्या शेष ही है!

सन्देश!

मुझमें और तुममें बस फर्क इतना-सा है, तुम्हे चैन से जीना है,मुझे चैन से मरना हैं! माँ, मदिरा, मैथुन,मत्स्य और मुद्रा! जब आप इन पञ्च मकारों से मुक्त होते है तो विद्या,विनय,विवेक, वय,वीरता इन पञ्च वकारों से युक्त होते हैं!

भारत और समृद्धि!

सन-सनन-सन-सन-सन सन्नाटा बोलेगा!........... जिस दिन जागृत भारत बस अपने उर में देखेगा..... जो नेता, अफसर-अधिकारी जीते हैं भारत के धन से... गर थोड़ी भी नियत बिगड़ी...उनका सिंहासन डोलेगा! अब भारत बोलेगा,समृद्धि बोलेगी!

नाभिक!

नाभिक में जब प्रोटान टकराते है तो परमाणु विस्फोट होता है! इसी सिद्धांत पर परमाणु बम बनता है! और जब दो प्रोटान या कण आपस मे मिलते है तो एक जबरदस्त ऊर्जा बनती है, इसे नाभिकीय संलयन कहते हैं सूर्य की अजस्र ऊर्जा के पीछे यही वजह है! इसी तरह जबतक भारत मे विभिन्न मजहब जाति इत्यादि अलग कण रहेंगे भारत का विखण्डन होता रहेगा! किन्तु जिस दिन भारत के लोग मात्र भारतीय होकर सनलयित हो जाएंगे! भारत सूर्य की तरह विश्व को पोसने लगेगा! मर्जी आप की है आप स्वतन्त्र हैं!

उर्वशी!

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मुझमें और तुझमें एक रिश्ता तो है.. कि जब मैं डूबता हूँ इश्क़ में तुम्हारे.. निर्जन रातों में मेरे श्वांसों की ध्वनियाँ, सुगंध तुम्हारी रग-रग में मेरे! प्रिय! इस कदर.. समहित होती हैं... मुझमें तुममे अभेद सम्बंध निर्जन रैन, रंग बरसावे तेरे संग हे मेरे प्रिय! स्पर्श तुम्हारा मेरे पाषाण-हृदय को पिघला-पिघला के पारस बनाता जाता.. चुम्बन तुम्हारा,आहिस्ता-आहिस्ता मय को विलीन करता कृष्ण में एक-एक बूंद प्रेम की यूँ स्पर्श करती हमें प्रिय! मैं सन्यस्त होता जाता! बर्फ के हैं ये स्वर्णिम पल कि पिघल-पिघल के मेघ निर्मित कर जाते! और अब एक बारिश होगी जो विश्व की समस्त लकीरों को मिटा देगी! एक विश्व,एक धर्म का उदय हो रहा है! एक धर्म जो निर्ग्रन्थ होगा सहज होगा! पूरा विश्व एक परिवार हो गया। मुझमे और तुममे एक रिश्ता तो है जो दिखता ही दिखता है पर दिखता नही! बस रैना आये... ले जाये मुझको तेरी ओर,उस छोर उड़कर, उछलकर, तैरकर बस रैना आये ले जाये मुझको मुझी से दूर... कर दे रिहा मुझे मुझसे ही... तुम्हारा चुम्बन हहहह! प्रिय! मुझमे और तुझमे एक रिश्ता तो है!

लड़कियाँ!

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माँ को कौन छल सकता है, लड़कियां टूटने के लिये नही; सृजन, सम्वर्धन, के लिये जानी जाती है! औऱ बड़े-बड़े छलियों को गर्भ में पाल, उनको जगतोद्धार के लिये के वात्सल्य भी प्रदान करती हैं! लड़कियां देवी होती हैं,दिव्य होती है, माँ होती हैं,ये लड़कियां! और यदि तुम खुद को धूर्त,दुष्ट,मनबढ़ समझते हो, तो रक्तबीज को भी निगल जाएं ऐसी माँ होती हैं लड़कियां! "अहिंष्य"

कैवल्यकामी!

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यात्रा करते-करते अब इस बिंदु पर हूं कि यहाँ से मात्र एक क्षलाँग, और मुक्त! मोक्ष नगरी में गया! किन्तु नही ये क्षलाँग लगेगी नही,इतनी शीघ्रता नही करनी है,अभी तुम सब को यहाँ लाना है,सबके साथ क्षलाँग लगेगी! अब तुम्हे रोगों से मुक्ति देने हेतु अनन्त पुनरावृत्ति हो,फर्क नही पड़ता। किन्तु क्षलाँग तो तुम्हारे संग ही लगेगी। ये निश्चित है... देखते है तुम्हारे "मय" में कितना जोर है!

साथी..११

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मेरी इस अनन्त चेतन यात्रा में साथी,मात्र तुम ही नही हो; अपितु अंनत परिस्थितियों में अनन्त लोग हैं। किन्तु तुम भी हो,तुम भी हो उनमे से एक जिनके साथ मेरी चेतना पूर्ण प्रस्फुटित होती है। मेरे अनुमान में तुम ही हो जो मुझे अनन्त जन्मों से मुकम्मल करते आयी हो। ये साथ स्थूल रूप से तो द्वैत प्रतीत होता है,किन्तु है नही द्वैत। निश्चित उद्घोष है मेरा ये कि मैं परमात्मा के निकट पहुंचा बिना परिश्रम के,उसमे तुम्हारा निःस्वार्थ प्रेम सहायक हुआ। तुम मुझमे सांस लेती हो,और मैं तुममें समाहित हूँ.. अब हम अद्वैत हो गए.. मैं औऱ तुम इस जीवनरूपी रंगमंच के पात्र मात्र है.. कबतक कहां तक इन प्रश्नों से बहुत दूर.. जन्नत के सरोवर में एक नौका पे बैठे हम,चांदनी चमकती तारों वाली रात्रि में प्रेम के बहाव में बह रहे हैं! दूर शहर में लोगों में उपद्रव मचा हुआ है। शुक्र है कि हम दूर है सरोवर रूपी परमात्मा के आश्रय में अभय होकर।आधे तुम आधा मैं डोर कृष्ण की और पूरे हुए हम।